झारखंड में इंटरमीडिएट शिक्षा संकट……शिक्षा नीति के फेर में छात्रों का भविष्य अंधकारमय, मौन हैं राजनीतिक दल और अभिभावक

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झारखंड में इंटरमीडिएट शिक्षा संकट……शिक्षा नीति के फेर में छात्रों का भविष्य अंधकारमय, मौन हैं राजनीतिक दल और अभिभावक

झारखंड की शिक्षा व्यवस्था इन दिनों एक गहरे संकट से गुजर रही है। राज्य सरकार द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के अनुपालन में लिए गए निर्णय के तहत अब राज्य के अंगीभूत डिग्री कॉलेजों में इंटरमीडिएट (11वीं–12वीं) की पढ़ाई और नामांकन पूरी तरह से बंद कर दिए गए हैं। यह बदलाव सुनियोजित नहीं, बल्कि जल्दबाजी और अव्यवस्था से भरा प्रतीत हो रहा है — जिससे राज्य के लाखों छात्र-छात्राओं का भविष्य अंधकार की ओर धकेला जा रहा है।

शिक्षा नीति या शिक्षा विनाश योजना?

राष्ट्रीय शिक्षा नीति के नाम पर डिग्री कॉलेजों से इंटरमीडिएट शिक्षा को हटाकर उसे केवल +2 स्कूलों और इंटर कॉलेजों तक सीमित कर देना, एक ऐसा निर्णय है जो ज़मीनी हकीकतों से कोसों दूर है। झारखंड के कई कॉलेज ऐसे थे, जहाँ वर्षों से इंटर की पढ़ाई होती रही, और वहीं छात्र छात्रावासों में रहकर बेहतर वातावरण में शिक्षा पाते थे। अब इन संस्थानों में नामांकन बंद कर देना, उन हजारों गरीब और ग्रामीण छात्र-छात्राओं के लिए एक बड़ा झटका है जो दूरदराज़ के क्षेत्रों से पढ़ने आते थे।

अभाव, अव्यवस्था और अनदेखी

सरकारी आदेश तो जारी हो गए, लेकिन क्या राज्य सरकार ने ये सुनिश्चित किया कि निकटवर्ती +2 स्कूलों में पर्याप्त सीटें, भवन, शिक्षक और हॉस्टल की सुविधाएँ मौजूद हैं? जवाब है — नहीं। परिणामस्वरूप — हजारों छात्र अभी भी यह नहीं जान पा रहे हैं कि उनका नामांकन कहाँ होगा। कई ऐसे विद्यार्थी जो कॉलेज हॉस्टलों में रहते थे, अब पढ़ाई छोड़ने की कगार पर हैं क्योंकि इंटर स्कूलों में हॉस्टल की सुविधा नहीं है। नामांकन प्रक्रिया में भ्रम और अपारदर्शिता व्याप्त है।

कर्मचारियों का रोष — 80 दिनों से धरने पर

एक तरफ मैट्रिक पास करने के बाद इंटरमीडिएट में नामांकन दाखिल करने असमंजस में राज्य के विद्यार्थी फंसे हुए हैं तो दूसरी ओर इंटर कॉलेजों में कार्यरत लगभग 600 अनुबंधित गैर-शिक्षण कर्मियों को भी बेरोजगारी की तलवार झेलनी पड़ रही है। ये सभी कर्मचारी पिछले 80 दिनों से राजभवन और विभाग के समक्ष धरने पर बैठे हैं, परंतु सरकार और शिक्षा विभाग की ओर से कोई संतोषजनक पहल नहीं हुई है।

राजनीतिक दलों और छात्र संगठनों की चुप्पी है शर्मनाक

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस गंभीर संकट पर राज्य के प्रमुख राजनीतिक दलों की चुप्पी हैरान करती है। ना तो सत्ता पक्ष के जनप्रतिनिधियों ने छात्रों के पक्ष में कोई ठोस बात की, और ना ही विपक्षी दलों ने इसे राज्यव्यापी आंदोलन का मुद्दा बनाया।

इसी प्रकार छात्र संगठन भी गहरे निद्रा में हैं। सिर्फ गिनी-चुनी आवाजें—जैसे कोल्हान छात्र संघर्ष समिति द्वारा जमशेदपुर में निकाली गई “न्याय यात्रा”—मात्र प्रतीकात्मक विरोध बनकर रह गई हैं। क्या झारखंड में अब छात्रों की शिक्षा पर संकट भी आंदोलन का विषय नहीं रहा?

अभिभावकों की निष्क्रियता — चिंता या बेबसी?

अभिभावक वर्ग की निष्क्रियता भी कम खतरनाक नहीं है। बच्चों के भविष्य को लेकर चिंता करने वाला वर्ग इस मुद्दे पर आवाज नहीं उठा रहा। यह चुप्पी बेबसी है या स्वीकारोक्ति — यह अलग बहस का विषय हो सकता है। लेकिन ये चुप्पी बच्चों के भविष्य को बर्बादी की ओर ले जा रही है।

छात्रों का भविष्य — एक डगमगाती नाव

मैट्रिक पास कर चुके लगभग एक लाख छात्र अब असमंजस में हैं। कहीं स्कूल में सीट नहीं है, कहीं दूरी अधिक है, कहीं सुविधाएँ नदारद हैं। ऐसे में झारखंड के पिछड़े जिलों के गरीब घरों के बच्चे अब या तो पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हो सकते हैं, या फिर कोई वैकल्पिक रास्ता ढूंढ़ने को।

यह स्थिति राज्य के सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने को झकझोर सकती है — जब युवा शिक्षा से कटेंगे तो बेरोजगारी, अपराध और पलायन जैसे दुष्परिणाम सामने आने तय हैं।

अब भी समय है — जागिए!

यह लेख एक चेतावनी है — राज्य सरकार के लिए भी और समाज के लिए भी। यदि जल्द ही इस फैसले की समीक्षा नहीं की गई, और यदि विकल्पों को स्पष्टता व सुविधा के साथ लागू नहीं किया गया, तो झारखंड में शिक्षा का पतन सुनिश्चित है।

राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे इस मुद्दे पर गंभीरता से हस्तक्षेप करें। छात्र संगठनों और शिक्षक संघों को आंदोलन का नेतृत्व करना होगा। और सबसे बढ़कर, अभिभावकों को अब अपने बच्चों की आवाज़ बनना होगा।

क्योंकि आज की चुप्पी, कल की त्रासदी बन सकती है।
झारखंड के भविष्य के साथ यह प्रयोग नहीं, एक अन्याय है — और इस अन्याय पर मौन रहना, सबसे बड़ी साझेदारी है।

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