

स्वतंत्रता संग्राम से जनसेवा तक : ईचागढ़ के पूर्व विधायक धनंजय महतो की संघर्षगाथा
विशेष आलेख | Manbhum Updates

ईचागढ़ और आसपास का क्षेत्र केवल प्राकृतिक संपदा, संघर्षशील ग्रामीण समाज और आंदोलनों के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि इस धरती ने ऐसे अनेक जननायकों को जन्म दिया है, जिन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा समाज और देश की सेवा में समर्पित किया। इन्हीं महान व्यक्तित्वों में एक नाम है स्वतंत्रता सेनानी, समाजसेवी और ईचागढ़ के पूर्व विधायक धनंजय महतो का।


धनंजय महतो का जीवन स्वतंत्रता आंदोलन के संघर्ष, अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ साहस, लोकतांत्रिक राजनीति, शिक्षा के प्रसार और समाजसेवा की लंबी यात्रा का उदाहरण है। उन्होंने गुलामी के दौर में अंग्रेजी शासन का विरोध किया और आजादी के बाद भी अपने क्षेत्र के विकास और लोगों के अधिकारों के लिए लगातार सक्रिय रहे। उपलब्ध स्रोतों के अनुसार उनका जन्म 8 अगस्त 1919 को नीमडीह प्रखंड के गुंडा गांव में हुआ था। उनके पिता क्षेत्रमोहन महतो किसान थे और माता का नाम रातुली देवी था।


बचपन से ही शिक्षा और संघर्ष की ओर झुकाव
धनंजय महतो की प्रारंभिक शिक्षा गांव के विद्यालय में हुई। आगे की शिक्षा के लिए उन्हें पुरुलिया जिले के लखनपुर उच्च माध्यमिक विद्यालय भेजा गया। छात्र जीवन में ही उनके भीतर देश और समाज के प्रति जागरूकता विकसित होने लगी थी।

इसी दौर में वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े। क्षेत्र के स्वतंत्रता सेनानी भीमचंद्र महतो के संपर्क और मार्गदर्शन ने उनके राजनीतिक एवं सामाजिक जीवन को नई दिशा दी। महज किशोरावस्था में उन्होंने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध आंदोलन में भाग लेना शुरू कर दिया था।





अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष
धनंजय महतो के जीवन की सबसे प्रेरक घटनाओं में से एक वर्ष 1936 की है। विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार को लेकर पुरुलिया में निकाले गए जुलूस में उन्होंने भाग लिया। इस दौरान ब्रिटिश पुलिस ने आंदोलनकारियों पर कार्रवाई की, जिसमें धनंजय महतो को गंभीर चोटें आईं।
हाथ और सिर में चोट लगने के बावजूद उनका हौसला नहीं टूटा। बल्कि इसके बाद वे और अधिक सक्रियता के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में जुट गए।
1942 का भारत छोड़ो आंदोलन और गिरफ्तारी
वर्ष 1942 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारत छोड़ो आंदोलन ने पूरे देश में अंग्रेजी शासन की नींव हिला दी थी। सिंहभूम और मानभूम क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रहा।
धनंजय महतो ने इस आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। सितंबर 1942 में भीमचंद्र महतो और धनंजय महतो के नेतृत्व में क्रांतिकारियों के एक दल ने ब्रिटिश शासन के प्रतीकों के खिलाफ कार्रवाई की। पुरुलिया के बड़ा बाजार स्थित पुलिस थाने को आग लगाए जाने की घटना के बाद अंग्रेजी हुकूमत ने आंदोलनकारियों पर कार्रवाई तेज कर दी।
धनंजय महतो को 3 अक्टूबर 1942 को गिरफ्तार किया गया और वे 17 अप्रैल 1943 तक पुरुलिया जेल में बंद रहे। लगभग साढ़े छह महीने का कारावास भी उनके भीतर के राष्ट्रप्रेम और संघर्ष की भावना को कमजोर नहीं कर सका।
रामगढ़ तक पैदल यात्रा
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान धनंजय महतो की सक्रियता का एक और उल्लेखनीय प्रसंग वर्ष 1943 का है। वे अपने अनेक साथियों के साथ पटमदा से रामगढ़ तक पैदल यात्रा कर अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अधिवेशन में पहुंचे। उस दौर में लंबी दूरी पैदल तय करना आसान नहीं था, लेकिन देश की आजादी के संकल्प ने उनके कदमों को आगे बढ़ाया।
आजादी के बाद भी संघर्ष जारी रहा
भारत को 1947 में स्वतंत्रता मिली, लेकिन धनंजय महतो के लिए संघर्ष समाप्त नहीं हुआ। उन्होंने आजादी के बाद अपना जीवन समाजसेवा और क्षेत्र के विकास के लिए समर्पित कर दिया।
वर्ष 1956 में मानभूम जिले के पुनर्गठन के दौरान उन्होंने क्षेत्रीय हितों से जुड़े आंदोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मानभूम के विभाजन और क्षेत्रीय पहचान से जुड़े सवालों पर उन्होंने लोगों के साथ मिलकर आवाज उठाई।
ईचागढ़ की जनता ने चुना अपना प्रतिनिधि
सामाजिक और राजनीतिक सक्रियता के कारण धनंजय महतो क्षेत्र में लोकप्रिय होते गए। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ने के बाद वे 1957 में ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र से बिहार विधानसभा के सदस्य निर्वाचित हुए। उनका विधायक कार्यकाल 1957 से 1962 तक रहा।
इसके बाद भी उनका सार्वजनिक जीवन लगातार सक्रिय रहा। वे 1976 से 1982 तक बिहार विधान परिषद के सदस्य रहे। इसके अलावा उन्होंने पंचायत, सहकारिता, शिक्षा और प्रशासनिक क्षेत्र से जुड़ी विभिन्न जिम्मेदारियां भी निभाईं।
शिक्षा को विकास का आधार माना
धनंजय महतो का मानना था कि किसी क्षेत्र का स्थायी विकास केवल सड़क और भवन बनाने से नहीं, बल्कि शिक्षा को मजबूत करने से होता है। यही कारण था कि उन्होंने क्षेत्र में शिक्षा के विस्तार को विशेष महत्व दिया।
उपलब्ध विवरणों के अनुसार वे सिंहभूम कॉलेज, चांडिल और रघुनाथपुर उच्च विद्यालय जैसी शिक्षण संस्थाओं की स्थापना से जुड़े रहे। शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान आने वाली पीढ़ियों को बेहतर अवसर देने की उनकी सोच को दर्शाता है।
गुंडा रेलवे स्टेशन के लिए पहल
धनंजय महतो ने अपने क्षेत्र की बुनियादी सुविधाओं के विकास के लिए भी प्रयास किए। तत्कालीन बिहार के मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र के कार्यकाल में नीमडीह के गुंडा रेलवे स्टेशन के निर्माण में उनकी भूमिका का उल्लेख मिलता है।
एक ग्रामीण क्षेत्र में रेलवे जैसी बुनियादी सुविधा का विकास केवल परिवहन का साधन उपलब्ध कराना नहीं था, बल्कि यह क्षेत्र के सामाजिक और आर्थिक विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम था।
सहकारिता और पंचायत व्यवस्था में भी योगदान
धनंजय महतो का सार्वजनिक जीवन केवल विधानसभा तक सीमित नहीं था। उन्होंने ग्रामीण अर्थव्यवस्था और स्थानीय स्वशासन से जुड़े संस्थानों में भी भूमिका निभाई।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार वे सिंहभूम जिला पंचायत परिषद के अध्यक्ष रहे। सहकारी बैंक में भी उन्होंने उपाध्यक्ष, सचिव और निदेशक जैसी जिम्मेदारियां संभालीं। इससे स्पष्ट होता है कि उनका राजनीतिक जीवन केवल चुनाव जीतने तक सीमित नहीं था, बल्कि वे संस्थागत स्तर पर भी क्षेत्र के विकास में योगदान देना चाहते थे।
आदित्यपुर औद्योगिक क्षेत्र के विकास में भूमिका
धनंजय महतो को 1984 से 1990 तक आदित्यपुर औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकरण (AIADA) का अध्यक्ष भी मनोनीत किया गया था। औद्योगिक क्षेत्र के विकास से जुड़े इस दायित्व ने उनके सार्वजनिक जीवन को एक नया आयाम दिया।
ग्रामीण राजनीति और स्वतंत्रता आंदोलन से निकला एक जननेता जब औद्योगिक विकास से जुड़ी महत्वपूर्ण संस्था की जिम्मेदारी संभालता है, तो यह उनके लंबे सार्वजनिक अनुभव और प्रशासनिक क्षमता का भी प्रमाण माना जा सकता है।
विस्थापितों के अधिकार की आवाज
चांडिल और आसपास के इलाके में स्वर्णरेखा परियोजना के कारण बड़ी संख्या में परिवारों के विस्थापन का सवाल लंबे समय तक महत्वपूर्ण रहा। उपलब्ध स्रोतों में उल्लेख है कि धनंजय महतो ने विस्थापित परिवारों के पुनर्वास और पुनर्स्थापन से जुड़े सवालों को भी उठाया था।
यह उनके राजनीतिक दृष्टिकोण की एक महत्वपूर्ण विशेषता थी—विकास के साथ-साथ उससे प्रभावित होने वाले लोगों के अधिकारों की चिंता।
राष्ट्रपति ने किया सम्मानित
स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका और आजादी के बाद समाजसेवा के लिए किए गए कार्यों को देखते हुए वर्ष 2006 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने उन्हें सम्मानित किया। यह सम्मान उनके लंबे सार्वजनिक जीवन और स्वतंत्रता संघर्ष में योगदान की राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृति के रूप में देखा गया।
गांधीवादी विचार और सादगी
धनंजय महतो के समकालीनों और उनके जीवन पर प्रकाशित श्रद्धांजलि लेखों में उन्हें कर्मठ, गांधीवादी सोच वाले नेता के रूप में याद किया गया है। वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी शैलेंद्र महतो ने उनके निधन के बाद उन्हें ऐसी पीढ़ी का प्रतिनिधि बताया था, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन देखा, उसमें भाग लिया और बाद में लोकतांत्रिक राजनीति के माध्यम से समाज की सेवा की।
उनकी खासियत यह थी कि स्वतंत्रता आंदोलन का अनुभव उनके राजनीतिक जीवन से कभी अलग नहीं हुआ। सत्ता उनके लिए लक्ष्य नहीं, बल्कि जनसेवा का माध्यम रही।
94 वर्ष की उम्र में निधन
लगभग नौ दशकों से अधिक का जीवन जीने के बाद धनंजय महतो का 2 जनवरी 2014 को 94 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके निधन के साथ स्वतंत्रता आंदोलन की उस पीढ़ी का एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त हुआ, जिसने अंग्रेजी हुकूमत का विरोध भी किया और स्वतंत्र भारत के निर्माण में अपनी भूमिका भी निभाई।
उनके निधन पर क्षेत्र में लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। उनकी पुण्यतिथि पर बाद के वर्षों में भी चांडिल क्षेत्र में कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहे, जिससे पता चलता है कि स्थानीय समाज में उनकी स्मृति आज भी जीवित है।
एक जरूरी तथ्य : नाम की समानता से न हो भ्रम
धनंजय महतो के नाम से जुड़ा एक महत्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट करना आवश्यक है। स्वतंत्रता सेनानी एवं पूर्व विधायक धनंजय महतो का निधन 2 जनवरी 2014 को 94 वर्ष की आयु में हुआ था।
वहीं 21 अक्टूबर 1982 के तिरुलडीह गोलीकांड में शहीद हुए धनंजय महतो एक अलग व्यक्ति थे, जो आदरडीह क्षेत्र के निवासी थे। उस गोलीकांड में अजीत महतो और धनंजय महतो की मौत हुई थी। इसलिए दोनों व्यक्तित्वों की घटनाओं को एक-दूसरे से जोड़ना ऐतिहासिक रूप से गलत होगा।
संघर्ष से सेवा तक की प्रेरक विरासत
धनंजय महतो की जीवनगाथा को केवल एक पूर्व विधायक या स्वतंत्रता सेनानी की कहानी के रूप में देखना उनके व्यक्तित्व को सीमित कर देना होगा।
एक किसान परिवार में जन्म लेकर छात्र जीवन में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ना, अंग्रेजी पुलिस की मार सहना, जेल जाना, आजादी के बाद क्षेत्रीय अधिकारों के लिए संघर्ष करना, विधायक और विधान परिषद सदस्य के रूप में जिम्मेदारी निभाना, शिक्षा संस्थाओं के विकास में योगदान देना, सहकारिता और पंचायत व्यवस्था में काम करना तथा औद्योगिक विकास से जुड़े महत्वपूर्ण दायित्व संभालना—उनका पूरा जीवन संघर्ष और सेवा का सम्मिलित उदाहरण रहा।
आज जब राजनीति में जनसेवा की परिभाषा अक्सर बदलती दिखाई देती है, तब धनंजय महतो का जीवन यह संदेश देता है कि सच्चा जनप्रतिनिधि वही है, जो अपने समय की चुनौतियों को समझे, जनता के बीच रहे और पद से अधिक समाज को महत्व दे।
ईचागढ़ की धरती के इस स्वतंत्रता सेनानी की कहानी आने वाली पीढ़ियों के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें देश की आजादी का संघर्ष, लोकतंत्र की स्थापना, ग्रामीण विकास, शिक्षा, क्षेत्रीय अधिकार और समाजसेवा—इन सभी की एक साथ झलक मिलती है।
धनंजय महतो का जीवन इतिहास का केवल एक पन्ना नहीं, बल्कि संघर्ष से सेवा और सेवा से समाज निर्माण की एक ऐसी विरासत है, जिसे याद रखना और नई पीढ़ी तक पहुंचाना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।

























