संघर्ष से शहादत तक : निर्मल महतो – जिसने झारखंड को सिर्फ राज्य नहीं, पहचान का सपना दिया

MANBHUM UPDATES
7 Min Read

संघर्ष से शहादत तक : निर्मल महतो – जिसने झारखंड को सिर्फ राज्य नहीं, पहचान का सपना दिया

08 अगस्त सिर्फ एक शहादत दिवस नहीं, झारखंड की राजनीतिक चेतना को याद करने का दिन है। यही वह दिन है, जब 1987 में झारखंड आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से एक निर्मल महतो की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। उनकी शहादत को दशकों बीत चुके हैं, लेकिन झारखंड की राजनीति और समाज में उनका नाम आज भी एक सवाल की तरह खड़ा है, क्या जिस झारखंड के लिए निर्मल दा ने संघर्ष किया था, वह झारखंड वास्तव में बन पाया है?

निर्मल महतो का राजनीतिक जीवन उस दौर में सामने आया, जब छोटानागपुर और संथाल परगना के आदिवासी-मूलवासी समाज के बीच अपनी जमीन, जंगल, संस्कृति, भाषा और राजनीतिक अधिकारों को लेकर असंतोष गहरा रहा था। अलग झारखंड राज्य की मांग केवल प्रशासनिक सीमाओं को बदलने की मांग नहीं थी। इसके पीछे एक व्यापक भावना थी, अपने संसाधनों पर अपना अधिकार और अपनी पहचान के साथ सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार।

निर्मल महतो इसी चेतना के एक मुखर प्रतिनिधि बने।

उनकी राजनीति का आधार केवल सत्ता हासिल करना नहीं था। वे झारखंड के स्थानीय लोगों को राजनीतिक रूप से संगठित करने, सामाजिक न्याय और आर्थिक अधिकारों की लड़ाई को मजबूत करने के पक्षधर थे। उनके लिए झारखंड की समस्या केवल गरीबी की समस्या नहीं थी, बल्कि यह राजनीतिक प्रतिनिधित्व, संसाधनों पर अधिकार और पहचान के सवाल से भी जुड़ी हुई थी।

निर्मल महतो की राजनीति में युवाओं की भूमिका महत्वपूर्ण थी। वे मानते थे कि कोई भी आंदोलन तभी मजबूत हो सकता है, जब समाज का युवा वर्ग उसके साथ खड़ा हो। यही कारण है कि उन्होंने युवाओं को झारखंड आंदोलन की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास किया।

उनका संघर्ष उस व्यवस्था के खिलाफ था, जिसमें झारखंड की धरती खनिजों से समृद्ध होने के बावजूद यहां के बड़े हिस्से में गरीबी, बेरोजगारी और विस्थापन दिखाई देता था। लौह अयस्क, कोयला, यूरेनियम और अन्य खनिजों से देश की अर्थव्यवस्था को ताकत देने वाली इस धरती के लोगों के सामने रोजी-रोटी और बुनियादी सुविधाओं का संकट बना रहना उनके लिए एक बड़ा राजनीतिक सवाल था।

निर्मल महतो की विचारधारा का मूल प्रश्न था, झारखंड के संसाधनों का लाभ आखिर किसे मिलना चाहिए?

यह सवाल आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

1987 में उनकी हत्या ने झारखंड आंदोलन को गहरा झटका दिया। लेकिन किसी आंदोलनकारी की हत्या उसके विचारों की हत्या नहीं कर सकती। निर्मल महतो की शहादत ने झारखंड आंदोलन की भावनाओं को और मजबूत किया। अंततः वर्ष 2000 में झारखंड अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आया।

लेकिन यहीं से एक दूसरा सवाल शुरू होता है।

क्या अलग राज्य बन जाना ही निर्मल महतो के सपने का अंत था?

शायद नहीं।

अलग झारखंड बनने के बाद राज्य ने राजनीतिक पहचान तो हासिल कर ली, लेकिन आज भी जमीन, विस्थापन, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पलायन और प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय अधिकार जैसे सवाल पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं।

आज भी झारखंड के कई गांवों में युवाओं के सामने रोजगार का संकट है। खनिज संपदा से समृद्ध इलाकों में रहने वाले लोगों का एक बड़ा वर्ग विकास के लाभ से वंचित है। कहीं जमीन का सवाल है, कहीं वनाधिकार का, कहीं विस्थापन का और कहीं स्थानीय युवाओं के रोजगार का।

ऐसे में निर्मल महतो को केवल फूल-माला चढ़ाकर याद करना उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि नहीं हो सकती।

सच्ची श्रद्धांजलि तब होगी, जब उनके विचारों पर बहस होगी।

निर्मल महतो की राजनीति को किसी एक दल या वर्तमान राजनीतिक समीकरण तक सीमित करके देखना भी उनके योगदान को छोटा करना होगा। वे जिस दौर में सक्रिय थे, उस समय झारखंड आंदोलन विभिन्न धाराओं और नेताओं का व्यापक संघर्ष था। उस संघर्ष में निर्मल महतो की अपनी विशिष्ट भूमिका थी।

आज राजनीतिक दलों के पास निर्मल महतो की तस्वीरें हैं, उनके नाम पर कार्यक्रम हैं, उनकी प्रतिमाओं पर माल्यार्पण है। लेकिन असली परीक्षा तब होगी, जब उनकी राजनीति के मूल सवालों पर जवाब देना पड़ेगा।

स्थानीय लोगों को रोजगार कितना मिला?
विस्थापितों को न्याय कितना मिला?
झारखंड के प्राकृतिक संसाधनों का लाभ यहां के लोगों तक कितना पहुंचा?
आदिवासी-मूलवासी समाज की राजनीतिक और आर्थिक भागीदारी कितनी बढ़ी?
और सबसे महत्वपूर्ण – झारखंड की युवा पीढ़ी को अपने भविष्य के लिए बाहर जाने को मजबूर क्यों होना पड़ रहा है?

निर्मल महतो का सपना केवल झारखंड का नक्शा बदलना नहीं था। वह झारखंड के भीतर सत्ता और विकास की दिशा बदलने का सपना था।

आज जब हम उनकी शहादत को याद कर रहे हैं, तो हमें यह तय करना होगा कि हम उन्हें इतिहास के एक अध्याय के रूप में याद करना चाहते हैं या उनके विचारों को वर्तमान की राजनीति का हिस्सा बनाना चाहते हैं।

शहादत दिवस का अर्थ सिर्फ अतीत को याद करना नहीं होता। यह वर्तमान से सवाल करने और भविष्य की दिशा तय करने का अवसर भी होता है।

निर्मल दा आज हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन उनके संघर्ष का सबसे बड़ा सवाल आज भी हमारे सामने है।

“जिस धरती के लिए बलिदान दिया गया, क्या उस धरती के लोगों को उनका अधिकार मिला?”

जब तक इस सवाल का ईमानदार जवाब नहीं मिलता, तब तक निर्मल महतो की शहादत सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि झारखंड की राजनीति के लिए एक जीवित प्रश्न बनी रहेगी।

निर्मल दा को नमन।
उनकी शहादत को नमन।
और उससे भी बढ़कर, उनके उस झारखंड के सपने को नमन, जिसमें जल-जंगल-जमीन, सम्मान, रोजगार और अधिकार के साथ हर झारखंडी अपने भविष्य को देख सके।

Share This Article