“लक्ष्मीकांत” के परम भक्त साहब! नीमडीह-कुकड़ू में रात होते ही बढ़ जाती है सक्रियता, “प्यारेलाल” से दूर-दूर तक नाता नहीं
नीमडीह, 25 मई : सरायकेला-खरसावां जिले के नीमडीह और कुकड़ू अंचल क्षेत्र में इन दिनों एक साहब की सक्रियता चर्चा का विषय बनी हुई है। क्षेत्र में लोग कहते फिर रहे हैं कि साहब सरकारी सेवा में जनता की सेवा करने नहीं, बल्कि “लक्ष्मीकांत” की आराधना करने आए हैं। “प्यारेलाल” से उनका कोई खास परिचय नहीं है, इसलिए निष्पक्ष कार्रवाई की उम्मीद करना भी शायद बेकार है। सूत्रों की मानें तो साहब का पूरा प्रशासनिक दर्शन केवल “लक्ष्मीकांत प्राप्ति योग” पर आधारित है। यही कारण है कि दिन हो या रात, सड़क हो या गांव का टोला, जहां “लक्ष्मीकांत” मिलने की संभावना दिखती है, वहां साहब की गाड़ी स्वतः पहुंच जाती है। हाल ही में चर्चा तब तेज हुई जब कुछ ट्रैक्टरों को साहब उठाकर ले आए। लोग समझे कि अब नियम-कानून का पहाड़ टूटेगा, लेकिन मामला कुछ दिन बाद वैसे ही ठंडा पड़ गया जैसे बरसात में अधजला कोयला। इधर नीमडीह में बालू लदे एक ट्रैक्टर पर भी साहब की कृपा दृष्टि पड़ी। कार्रवाई हुई, ट्रैक्टर पकड़ा गया, लेकिन आगे की कहानी और भी दिलचस्प बताई जा रही है। सूत्र बताते हैं कि ट्रैक्टर को थाना या जब्ती स्थल तक पहुंचाने के बजाय उसकी बैटरी खुलवाई गई और साहब के वाहन पर लादकर रवाना कर दी गई। उसके बाद कार्रवाई का पूरा अध्याय मानो सरकारी फाइलों के किसी रहस्यमयी पन्ने में खो गया। कुकड़ू क्षेत्र में भी तीन ट्रैक्टर पकड़े जाने की चर्चा है। ग्रामीणों के अनुसार शुरुआत में माहौल काफी सख्त दिखा, लेकिन जैसे ही “लक्ष्मीकांत” का दर्शन हुआ, वैसे ही तीनों ट्रैक्टरों को मोक्ष प्राप्त हो गया और वे स्वतंत्र होकर अपने-अपने मार्ग पर चल पड़े। अब साहब की रात्रिकालीन सक्रियता भी इलाके में खास चर्चा का विषय बनी हुई है। बताया जाता है कि रात ढलते ही साहब का प्रशासनिक रक्तचाप बढ़ जाता है और वे अभियान पर निकल पड़ते हैं। खास बात यह है कि इस दौरान कार्यालय की सुरक्षा में तैनात सुरक्षाकर्मी भी उनके साथ रहते हैं। ऐसे में लोग पूछ रहे हैं कि यदि उसी दौरान कार्यालय में कोई घटना हो जाए तो जिम्मेदारी किसकी होगी — “लक्ष्मीकांत प्रेमी साहब” की या प्रशासन की? राज्य सरकार और वरीय अधिकारी लगातार भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने, पारदर्शिता बढ़ाने और आम जनता को “प्यारेलाल” अर्थात निष्पक्ष कार्रवाई का भरोसा दिलाने की बात करते हैं। मगर यहां हालात कुछ अलग ही नजर आ रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि साहब के प्रशासनिक शब्दकोश में “प्यारेलाल” का पन्ना शायद फट चुका है और शेष बचा है तो सिर्फ “लक्ष्मीकांत” का अध्याय। फिलहाल क्षेत्र में चर्चा यही है कि जहां नियम-कानून कमजोर पड़ जाएं और “लक्ष्मीकांत” मजबूत हो जाए, वहां कार्रवाई कम और भयादोहन ज्यादा दिखाई देता है। जनता अब इंतजार में है कि आखिर कब “प्यारेलाल” की वापसी होगी और प्रशासन सचमुच सुशासन का चेहरा दिखाएगा।