खून के लिए जंग : देश में थैलेसीमिया बच्चों की सांसें अटकीं, झारखंड बना संकट का सबसे बड़ा संकेत

रांची, 17 मार्च : देश में स्वास्थ्य व्यवस्था की एक गंभीर हकीकत सामने आई है, जहां जीवन रक्षक रक्त की कमी अब एक राष्ट्रीय चिंता का विषय बनती जा रही है। झारखंड के 14 जिलों से सामने आए ताजा आंकड़े इस संकट की भयावह तस्वीर पेश कर रहे हैं, जहां 100 से अधिक थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों को पिछले 5 दिनों से खून का इंतजार करना पड़ रहा है।
यह केवल एक राज्य की समस्या नहीं, बल्कि पूरे देश के ब्लड मैनेजमेंट सिस्टम पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि थैलेसीमिया जैसे गंभीर रोग से जूझ रहे बच्चों के लिए नियमित रक्त चढ़ाना जीवन और मृत्यु के बीच की रेखा तय करता है। ऐसे में 5 दिनों तक रक्त नहीं मिलना, सिस्टम की गंभीर विफलता को दर्शाता है।
झारखंड के जिलों में सामने आए आंकड़े बताते हैं कि जरूरत और उपलब्धता के बीच खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है। राजधानी रांची में 2100 यूनिट खून की जरूरत के मुकाबले मात्र 50 यूनिट उपलब्ध है, जबकि धनबाद, बोकारो, पश्चिमी सिंहभूम जैसे औद्योगिक जिलों में भी हालात बेहद खराब हैं। कई जिलों में तो 25% तक भी रक्त उपलब्ध नहीं हो पा रहा है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, देश में हर साल लाखों यूनिट रक्त की आवश्यकता होती है, लेकिन स्वैच्छिक रक्तदान की कमी, जागरूकता का अभाव और ब्लड स्टोरेज व डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम की खामियां इस संकट को और गहरा बना रही हैं।
कोविड के बाद से रक्तदान शिविरों में कमी आई है, वहीं शहरी क्षेत्रों तक सीमित रक्तदान की संस्कृति ग्रामीण इलाकों तक नहीं पहुंच पाई है। इसका सीधा असर छोटे जिलों और वहां के मरीजों पर पड़ रहा है।
यह स्थिति केंद्र और राज्य सरकारों के लिए एक चेतावनी है कि केवल अस्पतालों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं, बल्कि ब्लड सप्लाई चेन को भी उतना ही मजबूत करना होगा।
अब जरूरत है राष्ट्रीय स्तर पर एक समन्वित रणनीति की—जिसमें नियमित रक्तदान को जन आंदोलन बनाया जाए, ब्लड बैंकों की क्षमता बढ़ाई जाए और जरूरतमंद मरीजों तक समय पर रक्त की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।
अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट आने वाले दिनों में और विकराल रूप ले सकता है—जहां खून की कमी, जिंदगी की सबसे बड़ी कीमत बन जाएगी।



