परंपरा की आड़ में अपराध का अड्डा बनी मुर्गा लड़ाई, हारुडीह गोलीकांड के बाद भी आयोजन पर अडिग प्रशासन?

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परंपरा की आड़ में अपराध का अड्डा बनी मुर्गा लड़ाई, हारुडीह गोलीकांड के बाद भी आयोजन पर अडिग प्रशासन?

चांडिल, 25 दिसंबर : कभी ग्रामीण संस्कृति और परंपरा का हिस्सा मानी जाने वाली मुर्गा लड़ाई अब अपराधियों और सट्टेबाजों के संरक्षण का खुला मंच बनती जा रही है। ताज़ा और भयावह उदाहरण बुधवार शाम चांडिल थाना क्षेत्र के हारुडीह गांव में सामने आया, जहां कथित तौर पर रुपयों की हिस्सेदारी से जुड़े विवाद में अज्ञात अपराधियों ने जमशेदपुर (मानगो) निवासी बिजय तिर्की की गोली मारकर हत्या कर दी। इस घटना में उसका एक साथी गंभीर रूप से घायल है, जिसका इलाज एमजीएम अस्पताल, जमशेदपुर में चल रहा है। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार मृतक बिजय तिर्की का आपराधिक इतिहास भी रहा है।

दिसंबर से फरवरी – मार्च के बीच क्षेत्र में लगने वाले मेलों के साथ मुर्गा लड़ाई का आयोजन आम बात हो गई है। इन आयोजनों में केवल मुर्गा प्रेमी ही नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर सट्टेबाज और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग भी जुटते हैं। खुलेआम जुआ (सट्टा) लगाया जाता है, जिससे क्षेत्र में असामाजिक तत्वों का जमावड़ा बढ़ता है और कानून-व्यवस्था पर सीधा खतरा उत्पन्न होता है।

हारुडीह गोलीकांड के ठीक बाद अब चांडिल के भुईयाडीह में आज से तीन दिवसीय मुर्गा लड़ाई के आयोजन की तैयारी की जा रही है। चिंताजनक बात यह है कि यह स्थान हारुडीह गांव से महज दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, वहीं टाटा–रांची राष्ट्रीय राजमार्ग के बिल्कुल समीप है। ऐसे में हजारों लोगों की भीड़, सट्टेबाजी और अपराधियों की मौजूदगी किसी भी समय बड़ी अप्रिय घटना को जन्म दे सकती है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब एक मुर्गा लड़ाई के दौरान जानलेवा वारदात हो चुकी है, तब भी यदि पुलिस अधीक्षक और जिला प्रशासन ऐसे आयोजनों को अनुमति देते हैं तो क्या यह सुरक्षा के लिहाज से घोर लापरवाही नहीं होगी? यदि भुईयाडीह या किसी अन्य स्थान पर मुर्गा लड़ाई के दौरान कोई और गंभीर घटना घटती है, तो उसकी जवाबदेही किसकी होगी—मेला समिति की या पुलिस प्रशासन की?

स्थानीय लोगों का कहना है कि परंपरा और संस्कृति की आड़ लेकर वर्षों से मुर्गा लड़ाई में सट्टेबाजी को खुला संरक्षण दिया जा रहा है। यही कारण है कि अपराधी बेखौफ होकर ऐसे आयोजनों को अपना सुरक्षित ठिकाना बना चुके हैं। हारुडीह जैसी घटनाएं इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि अब मुर्गा लड़ाई केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बन चुकी है।

अब आवश्यकता है कि पुलिस प्रशासन और जिला प्रशासन इस सच्चाई को स्वीकार करे और समय रहते कठोर निर्णय ले। यदि मुर्गा लड़ाई की आड़ में हो रहे गैर कानूनी कार्यों पर तत्काल प्रतिबंध नहीं लगाया गया, तो आने वाले दिनों में इससे जुड़ी घटनाएं और भी भयावह रूप ले सकती हैं। सवाल सीधा है—क्या किसी और निर्दोष की जान जाने के बाद ही प्रशासन नींद से जागेगा, या हारुडीह गोलीकांड को चेतावनी मानकर अब मुर्गा लड़ाई स्थल पर होने वाले सट्टेबाजी पर सख्त रोक लगाएगा?

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