वन विभाग की मनमानी पर भड़के ग्रामीण — ‘रन फॉर गजराज’ बना पक्षपात का प्रतीक, स्थानीय जनप्रतिनिधियों की अनदेखी से मचा बवाल

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वन विभाग की मनमानी पर भड़के ग्रामीण — ‘रन फॉर गजराज’ बना पक्षपात का प्रतीक, स्थानीय जनप्रतिनिधियों की अनदेखी से मचा बवाल

चांडिल, 06 अक्टूबर : दलमा की तराई में आयोजित ‘रन फॉर गजराज’ मैराथन अब जंगल की सुरक्षा से ज्यादा वन विभाग की मनमानी और दिखावे की राजनीति का प्रतीक बनकर सामने आ रही है। पर्यावरण संरक्षण के नाम पर आयोजित इस कार्यक्रम में विभाग ने जिस तरह स्थानीय जनप्रतिनिधियों, मुखियाओं और ग्रामीणों की उपेक्षा की, उसने लोगों में गहरी नाराज़गी और आक्रोश पैदा कर दिया है।

भादुडीह पंचायत के मुखिया बुड्ढेश्वर बेसरा ने चाकुलिया मोड़ स्थित संवाददाता सम्मेलन में वन विभाग पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि यह आयोजन पर्यावरण नहीं, अहंकार का प्रदर्शन था। पांचवीं अनुसूची क्षेत्र के आदिवासी मुखियाओं और ग्राम प्रधानों को बुलाना तो दूर, जानकारी तक देना वन विभाग ने जरूरी नहीं समझा।

उन्होंने कहा कि दलमा इको सेंसिटिव जोन के अंतर्गत आने वाले पंचायतों को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया। यह केवल उपेक्षा नहीं, बल्कि स्थानीय स्वशासन की अवमानना है। मुखिया ने चेतावनी दी कि यदि विभाग ने अपनी “दंभपूर्ण नीति” नहीं बदली, तो ग्रामीण संगठित आंदोलन की राह पर उतरेंगे।

16 किलोमीटर की दौड़, 4200 प्रतिभागी – लेकिन ‘स्थानीय’ ग़ायब!

वन्यप्राणी सप्ताह (2 से 8 अक्टूबर) के मौके पर झारखंड सरकार के वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग और टाटा स्टील जियोलॉजिकल सोसाइटी के संयुक्त तत्वावधान में रविवार को दलमा क्षेत्र में 16 किलोमीटर लंबी “रन फॉर गजराज” मैराथन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्घाटन विधायक सविता महतो और उपायुक्त नितीश कुमार सिंह ने किया। मंच पर अधिकारियों की लंबी फेहरिस्त थी — डीएफओ सबा आलम अंसारी, रेंज ऑफिसर दिनेश चंद्रा, शशी रंजन प्रकाश सहित अन्य अधिकारी मौजूद रहे — पर स्थानीय जनता और प्रतिनिधि गायब थे।

उत्तर प्रदेश का जलवा, झारखंड के धावक किनारे

मैराथन के नतीजे खुद वन विभाग की नीति पर सवाल खड़े कर रहे हैं। महिला वर्ग में पहले पांचों स्थान उत्तर प्रदेश की धाविकाओं ने कब्जा लिया — अंशिका पटेल, वंदना, बबिता कुमारी, पूनम निषाद और अंजलि पटेल। पुरुष वर्ग में भी हाल यही रहा — पहले चार विजेता फिर से उत्तर प्रदेश से, जबकि झारखंड का नाम मात्र के लिए सातवें स्थान पर रहा।

ग्रामीणों का सवाल वाजिब है — जब उद्देश्य दलमा के पर्यावरण के प्रति स्थानीय लोगों में जागरूकता फैलाना था, तो फिर झारखंड के युवाओं को हाशिये पर क्यों धकेला गया?

“वन विभाग का कार्यक्रम नहीं, प्रपंच था यह” — ग्राम प्रधान आनंद सिंह

काठजोड़ के ग्राम प्रधान आनंद सिंह ने आरोप लगाया कि वन विभाग ने पहले से तय परिणामों के साथ “रन फॉर गजराज” को एक सजावटी आयोजन बना दिया। उन्होंने कहा स्थानीय युवाओं को किनारे कर बाहरी प्रतिभागियों को विजेता बनाना वन विभाग की योजना का हिस्सा था। यह वही पुरानी मानसिकता है — दिखावे के लिए जंगल बचाओ, और असल में स्थानीयों को हाशिए पर डालो।

ग्रामीणों की चेतावनी — अब नहीं सहेंगे यह अपमान

ग्रामीणों का कहना है कि दलमा क्षेत्र के चांडिल, नीमडीह, बोड़ाम और पटमदा प्रखंडों के युवाओं को इस कार्यक्रम से जानबूझकर दूर रखा गया, ताकि विभाग के “विशेष मेहमान” विजेता बन सकें। जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि वन विभाग अब जंगलों का नहीं, बल्कि “प्रायोजित दिखावे का” प्रबंधन कर रहा है।

“रन फॉर गजराज” जहां एक ओर वन्यजीव संरक्षण की भावना को आगे बढ़ाने का दावा करता है, वहीं दूसरी ओर इस आयोजन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वन विभाग और पर्यावरण संरक्षण की नीतियाँ अब ग्रामीण सहभागिता से नहीं, बल्कि अफसरशाही और प्रचारप्रियता से संचालित हो रही हैं।

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