वोट के समय याद आते हैं आदिवासी, सड़क के लिए खुद उठाना पड़ा फावड़ा

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विधायक को लिखित आवेदन के बाद भी नहीं हुई पहल, 200 परिवारों ने चंदा जुटाकर श्रमदान से तीन किलोमीटर रास्ता बनाया

नीमडीह, 14 सितंबर : ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र के आदिवासी बहुल गांवों में विकास के दावों की जमीनी हकीकत एक बार फिर सामने आई है। चुनाव के दौरान जिन इलाकों में ग्रामीण लोकतंत्र के पर्व में बढ़-चढ़कर मतदान करते हैं, उन्हीं इलाकों के करीब 200 परिवार आज भी बुनियादी सड़क सुविधा के लिए सरकारी व्यवस्था और जनप्रतिनिधियों की ओर देख रहे हैं। स्थिति यह हो गई कि जब लंबे समय तक कोई पहल नहीं हुई तो ग्रामीणों ने सरकारी मदद की उम्मीद छोड़कर खुद ही सड़क बनाने का फैसला कर लिया।

मामला नीमडीह प्रखंड की बाड़ेदा पंचायत के सियालगोड़ा गांव के टोला काशीडीह, रापकाड़ा और भूषणडीह का है। पूर्वी सिंहभूम जिले की सीमा से सटे इन टोले के करीब 200 परिवार बारिश के मौसम में कीचड़ और खराब रास्ते से आवागमन करने को मजबूर थे। ग्रामीणों के अनुसार, पक्की सड़क की मांग को लेकर ईचागढ़ विधायक को लिखित आवेदन भी दिया गया था, लेकिन अपेक्षित पहल नहीं हुई।

आखिरकार ग्रामीणों ने अपने स्तर पर सड़क को चलने लायक बनाने का निर्णय लिया। प्रत्येक परिवार से चंदा जुटाया गया। इसके बाद करीब 110 ट्रैक्टर ट्रिप मुरुम-मिट्टी मंगाई गई और ग्रामीणों ने स्वयं श्रमदान कर लगभग तीन किलोमीटर लंबे रास्ते पर मुरुम-मिट्टी बिछाकर उसे दुरुस्त किया।

ग्रामीणों का यह प्रयास सिर्फ सड़क बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था पर भी बड़ा सवाल है, जो वर्षों से गांवों तक बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने का दावा करती रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि इलाके में सड़क के साथ बेहतर स्वास्थ्य सुविधा और पेयजल की समस्या भी बनी हुई है। सवाल यह है कि अगर ग्रामीण अपने चंदे और श्रमदान से सड़क को चलने लायक बना सकते हैं, तो सरकारी योजनाओं और जनप्रतिनिधियों की भूमिका आखिर कहां है?

ग्रामीणों के मुताबिक, चुनाव के समय नेताओं और जनप्रतिनिधियों से विकास के बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं। लेकिन चुनाव बीतने के बाद वही गांव अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए वर्षों तक अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के कार्यालयों के चक्कर लगाने को मजबूर हो जाते हैं। बाड़ेदा पंचायत की यह तस्वीर उन दावों की जमीनी पड़ताल करने के लिए पर्याप्त है।

सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि आदिवासी बहुल और सीमावर्ती इलाकों में सड़क जैसी बुनियादी सुविधा के लिए ग्रामीणों को अपनी जेब से पैसा लगाकर श्रमदान क्यों करना पड़ रहा है? क्या संबंधित विभाग और स्थानीय जनप्रतिनिधियों को ग्रामीणों की परेशानी की जानकारी नहीं थी? और यदि जानकारी थी, तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

सड़क निर्माण में बाड़ेदा के मुखिया बरुण सिंह, बलराम मार्डी, श्याम प्रसाद हांसदा, जीतू बेसरा, राजू सोरेन, गाजीराम सोरेन, सोम हेम्ब्रम सहित अन्य ग्रामीण शामिल रहे।

ग्रामीणों का श्रमदान फिलहाल सड़क को आवागमन योग्य बना गया है, लेकिन उनकी मूल मांग अब भी वही है। कच्चे रास्ते पर मुरुम डालना स्थायी समाधान नहीं, उन्हें पक्की और टिकाऊ सड़क चाहिए। अब देखना यह है कि ग्रामीणों के इस सामूहिक प्रयास के बाद जनप्रतिनिधि और संबंधित सरकारी विभाग जागते हैं या फिर यह सड़क भी अगले चुनाव तक सिर्फ वादों की फाइल में ही पड़ी रहती है।

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